Sat. Oct 23rd, 2021

विश्लेषण : एक झटके में क्यों बदल गई पूरी बीजेपी सरकार? क्या फेल हो गया गुजरात मॉडल ?

अहमदाबाद। गुजरात में बीजेपी सरकार के नए मंत्रिमंडल ने शपथ ले ली है. नई कैबिनेट में पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी की सरकार वाले एक भी मंत्री को जगह नहीं दी गई है. बीजेपी ने सभी पुराने मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. यानी एक तरह से आगामी विधानसभा चुनावों से क़रीब एक साल पहले बीजेपी ने गुजरात में पूरी सरकार को बदल दिया है. विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी ने ये फेरबदल गुजरात में दरकती सियासी ज़मीन को रोकने और देशभर के बेजीपी नेताओं को संदेश देने के लिए किया है. सवाल ये भी उठ रहा है कि जिस गुजरात मॉडल का प्रचार बीजेपी ने देशभर में किया है, क्या अब वो कमज़ोर पड़ गया है?

नए मंत्रियों में से चुनिंदा के पास ही सरकार में रहने का अनुभव है. इनमें से राघवजी पटेल 90 के दशक में शंकरसिंह वघेला सरकार में मंत्री रह चुके हैं, जबकि कृष्णानाथ राणा राज्य की नरेंद्र मोदी सराकर में मंत्री थे. राजेंद्र त्रिवेदी आनंदीबेन पटेल की सरकार में मंत्री थे.

क्यों हुआ इतना बड़ा फ़ेरबदल?
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक जतिन देसाई मानते हैं कि बीजेपी को लग रहा था कि गुजरात में उसका मज़बूत किला दरक रहा है और अगर तुरंत कुछ नहीं किया गया तो हालात हाथ से बाहर हो जाएँगे. देसाई कहते हैं, “रूपाणी और उनकी टीम का प्रदर्शन बहुत ख़राब था और बीजेपी नेताओं को लगा कि इसके दम पर चुनाव नहीं लड़ा जा सकता है. बीजेपी ने सरकार विरोधी लहर को कम करने और लोगों की नाराज़गी से बचने के लिए सरकार को बदला है.”

वहीं बीबीसी गुजराती सेवा के संपादक अंकुर जैन कहते हैं, “इसके दो बड़े कारण हैं. पहला तो ये कि बीजेपी जनता को ये संदेश देना चाहती है कि अगर मंत्री भी काम नहीं कर करेंगे तो हम उन्हें भी हटा देंगे. आने वाले दिनों में हो सकता है कि बीजेपी इस बात को ज़ोर-शोर से जनता में उठाए कि पार्टी के लिए जनता पहले है और अपने नेता बाद में.”

अंकुर कहते हैं, “भारतीय जनता पार्टी के लिए गुजरात मॉडल बेहद अहम है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने गुजरात में कई प्रयोग कर किए हैं. ऐसे में दूसरा कारण ये हो सकता है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह बाक़ी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को ये संदेश दे रहे हों कि अगर वो भी काम ठीक से नहीं करेंगे, तो उन्हें भी हटाया जा सकता है.”

अंकुर जैन के मुताबिक़, “अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने गुजरात में इतना बड़ा फेरबदल करके देशभर के बीजेपी नेताओं और मंत्रियों को ये संदेश दे दिया है कि पूर्ण इम्यूनिटी या सुरक्षा किसी के पास नहीं हैं. पार्टी जब चाहे, जिसे चाहे हटा सकती है. यूपी या दूसरे राज्यों के सीएम को ये संदेश देने की कोशिश की गई होगी कि अगर आप पार्टी की नीति या लाइन के हिसाब से काम नहीं कर रहे हैं तो आपको भी बदला जा सकता है.”

ख़तरे को भांप लिया है अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने?
गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है. बीजेपी शीर्ष नेतृत्व इस बात को अच्छी तरह से समझता है कि अगर गुजरात में सियासी ज़मीन दरकी, तो वह केंद्र में उनकी सत्ता पर भी सवाल उठेंगे. विश्लेषक मानते हैं कि गुजरात में लोगों के असंतोष और नाराज़गी से नेतृत्व वाकिफ़ था और ऐेसे में पार्टी ने बड़ा क़दम उठाते हुए पूरी सरकार को ही बदल दिया है.

अंकुर जैन कहते हैं, “कोरोना महामारी के दौरान बीजेपी सरकार ने अपनी रही-सही साख भी गँवा दी थी, ख़ासकर कोविड प्रबंधन को लेकर सरकार को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा. बीजेपा के शीर्ष नेता नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने इस ख़तरे को भाँप लिया था. उन्हें लगने लगा था कि अगर ऐसे ही सब चलता रहा, तो 2022 के चुनाव में पार्टी को गुजरात में हार का सामना भी करना पड़ सकता है.”

वहीं जतिन देसाई कहते हैं, “सरकारी आँकड़ों के मुक़ाबले वास्तविकता में कहीं अधिक लोगों की मौत कोरोना की वजह से हुई है और इसे लेकर गुजरात के लोगों में भारी असंतोष है. बीजेपी पूरी सरकार को हटाकर उस असंतोष को ही ख़त्म करने का प्रयास कर रही है.” “एंटी इन्कम्बेंसी और सरकार के ख़राब प्रदर्शन की वजह से लोगों में बीजेपी के ख़िलाफ़ जो भावना बन रही थी, उसे रोकने के लिए सरकार को बदला गया है. ख़ासकर मोदी और शाह के लिए गुजरात बेहद अहम है, ऐसे में पार्टी यहाँ कोई रिस्क नहीं लेना चाहती है.”

कुछ महीने पहले केंद्र सरकार में मंत्रिमंडल में फ़ेरबदल हुआ था और अन्य पिछड़ा वर्ग से बड़ी तादाद में मंत्रियों को रखा गया था. प्रधानमंत्री मोदी की नई सरकार में 12 दलित मंत्री हैं और 27 ओबीसी मंत्री हैं. जतिन देसाई कहते हैं, “जिस तरह यूपी चुनाव को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार में ओबीसी मंत्रियों को जगह दी गई है उसी तरह गुजरात की नई सरकार में भी जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश की गई है.” गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है. पार्टी यहां कोई जोख़िम उठाना नहीं चाहती है

गुजरात में सीएम और मंत्रियों को बदले जाने से पहले ही ये चर्चाएँ चलने लगी थीं कि सरकार में फ़ेरबदल हो सकता है. लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि ना सिर्फ़ मुख्यमंत्री को बदला बल्कि पूरी कैबिनेट को ही बदल दिया गया. क्या गुजरात मॉडल नाकाम हो गया है, इस सवाल पर देसाई कहते हैं, “गुजरात के विकास मॉडल की बात होती है, लेकिन अगर आप आँकड़ें देखेंगे तो सामाजिक विकास के सूचकांकों में गुजरात देश के बाक़ी राज्यों के मुक़ाबले काफ़ी पीछे है.”

”बीजेपी हाई कमान को ये लगता रहा था कि गुजरात उनका गढ़ है और वहाँ पार्टी का कुछ नहीं हो सकता. लेकिन अब पार्टी ने गुजरात के गढ़ में अपने सभी कमांडरों को हटा दिया है इससे ये तो बिल्कुल स्पष्ट है कि गुजरात में बीजेपी में और सरकार में सबकुछ ठीक नहीं है. पार्टी ने अपने अंदरूनी आकलन में ये भी स्वीकार किया होगा कि यहाँ क़िला दरक गया है.” समूची सरकार को हटाने के बाद ये सवाल उठा है कि ऐसे करके बीजेपी सरकार की नाकामियों को छुपा पाएगी और क्या इसके बाद देशभर में बीजेपी के प्रदर्शन पर सवाल नहीं उठेंगे?

जतिन देसाई कहते हैं, “इसने पार्टी के प्रदर्शन को तो निश्चित तौर पर सवालों के घेरे में ला दिया है. जहाँ पार्टी सबसे मज़बूत थी, वहाँ ऐसा करना पड़ रहा है इससे ज़ाहिर है कि ज़मीनी हक़ीक़त क्या है. लेकिन बीजेपी ने ये भी दिखाया है कि वह स्थिति को समझ रही है और ज़रूरी क़दम उठा रही है.” सवाल ये भी उठ रहा है कि एक ही झटके में सत्ता से बाहर कर दिए राजनेता क्या चुप बैठेंगे और कहीं वो बीजेपी को नुक़सान तो नहीं पहुँचाएँगे? इस पर जतिन देसाई कहते हैं, “बीजीपी ने सभी मंत्रियों को हटाकर ये स्वीकार किया है कि सभी मंत्रियों का प्रदर्शन ख़राब था. ऐसे में शायद बीजेपी आगामी चुनाव में उन्हें टिकट भी ना दे. मंत्रीपद जाने के बाद जब टिकट भी कट जाएगा, तो ये लोग चुप तो बैठेंगे नहीं, कुछ ना कुछ तो ज़रूर करेंगे.”

पाटीदारों की नाराज़गी सबसे बड़ी वजह?

विजय रूपाणी की अगुआई में जो सरकार थी, उस पर 2017 से ही सवाल उठ रहे थे. सरकार में शामिल ग़ैर पाटीदार नेता, ख़ासकर कोली और ठाकुर समाज के नेता, कहीं ना कहीं अपना गुस्सा ज़ाहिर करते रहे थे. पिछले कुछ सालों में गुजरात की राजनीति में हार्दिक पटेल का उदय हुआ. बड़ी तादाद में पटेल समुदाय उनके पीछे खड़ा हुआ. हार्दिक पटेल अभी कांग्रेस में हैं, उनके अलावा दूसरे पाटीदार नेताओं की सरगर्मियाँ भी बढ़ गईं थीं. बीजेपी को लग रहा था कि पाटीदार समुदाय उसके हाथ से निकल गया है. विश्लेषक मानते हैं कि इसी समुदाय को साधने के लिए भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया गया है. गुजरात में क़रीब 15 फ़ीसदी मतदाता पाटीदार हैं. प्रदेश की 182 सीटों में से 44 पाटीदार विधायक हैं. इससे पहले आनंदीबेन पटेल गुजरात की सीएम थीं, जो पाटीदार समुदाय से थीं. अब फिर से पाटीदार को ही मुख्यमंत्री बनाया गया है. पाटीदार समुदाय पारंपरिक तौर पर बीजेपी के साथ रह रहा हैं, ऐसे में पार्टी को ये आशंका थी कि अगर इस समुदाय की नाराज़गी बढ़ती गई तो उसके लिए सत्ता में बने रहना मुश्किल हो जाएगा.

क्या आगे आसान होगी बीजेपी की राह?

विजय रूपाणी को शीर्ष नेतृत्व का क़रीबी माना जाता था, लेकिन अब उनका पत्ता काट दिया गया है. 2017 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने अपना प्रदर्शन बेहतर करते हुए 16 सीटों की बढ़त हासिल की थी. कांग्रेस ने 77 और बीजेपी ने 99 सीटें हासिल की थीं. जतिन देसाई कहते हैं, “पिछले चुनाव में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया था और अब आम आदमी पार्टी की भी एंट्री हो गई है, ऐसे में बीजेपी का सफ़र आसान तो नहीं ही रहेगा.” देसाई कहते हैं, “2017 चुनावों में बीजेपी दक्षिण गुजरात और सूरत में अपने प्रदर्शन के दम पर सत्ता में आई थी. सूरत में व्यापारी पार्टी से नाराज़ थे, ऐसा लग रहा था कि बीजेपी को वोट नहीं मिलेगा, लेकिन फिर भी बीजेपी यहाँ सीटें जीतने में कामयाब रही और यहीं से सत्ता में पहुँची. अब एक बार फिर सूरत में बीजेपी से नाराज़गी दिख रही है.” देसाई कहते हैं, “इस बार आप ने सूरत में बड़े पैमाने पर एंट्री की है और वह बीजेपी के वोट में सेंध मार सकती है.”

बीजेपी ने आगामी चुनावों पर फ़ोकस करते हुए ही सरकार को बदला है ऐेसे में सवाल उठता है कि क्या पार्टी को इससे चुनावों में फ़ायदा मिलेगा? जतिन देसाई कहते हैं, “सरकार विरोधी लहर को काउंटर करने के लिए नई सरकार बनाई गई है, जातीय समीकरण भी साधने की कोशिश की गई है. लेकिन इस सबके बावजूद ये लगता नहीं कि गुजरात में अब बीजेपी के लिए सफ़र आसान होगा. पार्टी को बहुत कड़ी चुनौती मिलने जा रही है और ये बात बीजेपी नेता भलीभाँति समझ रहे हैं.”

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